25.6.21

खाती जाति का इतिहास:khati jati ka itihas





 चंद्रवंशी खाती समाज श्री पुत्र सहस्त्रबाहु के पुत्र है । समाज के इष्टदेव भगवान जगदीश है , कुलदेवी महागौरी अष्टमी है , कुलदेव भैरव देव और आराध्या देव भोले शंकर है । खाती समाज भगवान परशुराम जी के आशीर्वाद से उत्त्पन्न जाती है .।इस जाती के लोग सुन्दर और गोर वर्ण अर्थात ‘गोरे ’आते है । क्षत्रिय खाती समाज जम्मू कश्मीर के अभेपुर और नभेपुर के मूल निवासी है आज भी चंद्रवंशी लोग हिमालय क्षेत्र में केसर की खेती करते है । समाज के लिए दोहे प्रसिद्द है ”उत्तर देसी पटक मूलः ,नभर नाभयपुर रे ,चन्द्रवंश सेवा करी ,शंकर सदा सहाय” और ”चंद्रवंशम गोकुलनंदम जयति ”भगवान जगदीश के लिए ।
समाज १२०० वर्ष पहले से ही कश्मीर से पलायन करने लग गया था और भारत के अन्य राज्यों में बसने लग गया था । समकालीन राजा के आदेश से समाज को राज छोड़ना पड़ा था। खाती समाज के लोग बहुत ही धनि और संपन्न थे , उच्च शिक्षा को महत्व दिया जाता था ।
  जाति इतिहासविद डॉ. दयाराम आलोक के मतानुसार जम्मू कश्मीर के अलाउद्दीन ख़िलजी ने १३०५ में मालवा और मध्य भारत में विजय प्राप्त की |  चन्द्रवंशी खाती समाज के सैनिक भी सैना का संचालन करते थे विजय से खुश होकर ख़िलजी ने समाज को मालवा पर राज करने को कहा परन्तु समाज के वरिष्ठ लोगो ने सोच विचार कर जमींदारी और खेती करने का निश्चय किया. इस तरह कश्मीर से आने के बाद ३५ वर्ष तक समाज मांडवगढ़ में रहा इसके बाद आगे बढ़कर महेश्वर जिसे महिष्मति पूरी कहते थे वहां आकर रहने लगे महेश्वर चंद्रवंशी खाती समाज के पूर्वज सहस्त्रार्जुन की राजधानी था आज भी महेश्वर में सहस्त्रबाहु का विशाल मंदिर बना है जिसका सञ्चालन कलचुरि समाज करता है।
४५ वर्षो तक रहने के बाद वहाँ से इंदौर, उज्जैन, देवास, धार, रतलाम, सीहोर, भोपाल , सांवेर आदि जिलो में बसते चले गए और खाती पटेल कहलाये । मालवा में खाती समाज के पूर्वजो ने ४४४ गाँव बसाये जिनकी पटेली की दसियाते भी उनके नाम रही।
खाती समाज का गौरव पूर्ण इतिहास रहा है । समाज के कुल १०५ गोत्र है जिसमे से ८४ गोत्र मध्यप्रदेश में है और मध्यप्रदेश के १६ जिलो में है और १२५० गाँवों में निवास करते है । मध्यप्रदेश की धार्मिक राजधानी उज्जैन में चंद्रवंशी खाती समाज के इष्ट देव जगदीश का भव्य प्राचीन मंदिर है जहा हर वर्ष आषाढ़ शुक्ल पक्ष की द्वितिय को भगवान की रथयात्रा निकलती है समाज जन और भक्तजन अपने हाथो से रथ खींचकर भगवान को नगर भ्रमण करवाते है |
चन्द्रवंश या सोमवंश के राजा कीर्तिवीर्य बहुत ही धर्मात्मा हुआ करते थे । उनके पुत्र का नाम सहस्त्रबाहु या सहस्त्रार्जुन रखा गया, सोमवंश के वंशज थे इसलिए राजवंशी खत्री कहलाए ।सहस्त्रार्जुन ने नावों खंडो का राज्य पाने के लिए भगवान रूद्र दत्त का ताप किया और ५०० युगों तक तप किया इस से प्रभावित होकर भगवान शंकर ने उन्हें १ हज़ार भुजा और ५०० मस्तक दिए । उसके बाद उनका सहस्त्रबाहु अर्थात सौ भुजा वाला नाम पड़ा । महेश्वर समाज के पूर्वज सहस्त्रार्जुन की राजधानी रहा जहा ८५००० सालो तक राज्य किया । महेश्वर के निकट सहस्त्रार्जुन ने नर्मदा नदी को अपनी हज़ार भुजाओं के बल से रोकना चाहा परन्तु माँ नर्मदे उसकी हज़ार भुजाओं को चीरती हुई आगे निकल गई इसलिए उस स्थान को सहस्त्रधारा के नाम से जाना जाने लगा जहा आज भी १००० धाराएं अलग अलग दिखाई देती है ।
सहस्त्रार्जुन के लिए दोहा प्रसिद्द है
”नानूनम कीर्तिविरस्य गतिम् यास्यन्ति पार्थिवः ! यज्ञेर्दानैस्तपोभिर्वा प्रश्रयेण श्रुतेन च !
अर्थात सहस्त्रबाहु की बराबरी यज्ञ, दान, तप, विनय और विद्या में आज तक कोई राजा नहीं कर सका ।
एक दिन देवो पर विजय प्राप्त करने के बाद विश्व विजेता रावण ने अर्जुन पर आक्रमण कर दिया परन्तु सहस्त्रार्जुन ने रावण को बंधी बना लिया और रावण द्वारा क्षमा मांगने पर महीनो बाद छोड़ा फिर भगवान नारायण विष्णु के छटवे अंश ने परशुराम जी का अवतार धारण किया और सहस्त्रबाहु का घमंड चूर किया । इस युद्ध स्थल में १०५ पुत्रों को उनकी माता लेकर कुलगुरु की शरण में गई । राजा श्री जनक राय जी ने रक्षा का वचन दिया और १०५ भाइयों को क्षत्रिय से खत्री कहकर अपने पास रख लिया और ब्राह्मण वर्ण अपना कर सत्य सनातन धर्म पर चलने का वादा किया । १०५ भाइयों के नाम से उनका वंश चला और खाती समाज के १०५ गोत्र हुए | चन्द्रवंश की १०५ शाखाये पुरे भारत में राजवंशी खत्री भी कहलाते है । देश में समाज की जनसँख्या २ करोड़ से अधिक मप्र में जनसँख्या । ५० लाख भारत के राज्यों में ।
समाज दिल्ही, हरयाणा, पंजाब, जम्मू कश्मीर, राजस्थान,उत्तर प्रदेश,हिमाचल प्रदेश, गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, असम आदि ….
विदेशो में समाज नेपाल, तजफिस्टन, चिली, अमेरिका, फ्रांस, कनाडा और थाईलैंड में है । चंद्रवंशी क्षत्रिय खाती समाज के इष्टदेव भगवान जगन्नाथ है।जो साधना के देदीप्यमान नक्षत्र है जिनका सत्संग और दर्शन तो दूर नाम मात्र से ही जीवन सफल हो जाता है।
हिन्दू धर्म के चारधाम में एक धाम जगन्नाथपुरी उड़ीसा में है और खाती समाज का भव्य पुरातन व बहुत ही सुन्दर मंदिर पतित पावनि माँ क्षिप्रा के तट पर है । भगवान महाकाल की नगरी अवंतिकापुरी उज्जैन देश की केवल एक मात्र नगरी है जहा संस्कार और संस्कृति का प्रवाह सालभर होता रहता है।यह पर डग डग पर धर्म और पग पग पर संस्कृति मौजूद है ।
 खाती समाज का एक महापर्व भगवान जगदीश की रथयात्रा है इस अवसर पर समाज के इष्टदेव भगवान जगन्नाथ पालकी रथ पर विराजते है और नगर भ्रमण करते है ।हर वर्ष आषाढ़ शुक्ल २ को निकलती है ।इस दिन उज्जैन जगन्नाथपुरी सा दिखाई पड़ता है । भगवान जगन्नाथ भाई बलभद्र , बहिन सुभद्रा की मूर्तियों का आकर्षक श्रृंगार किया जाता है और मंदिर की विद्युत सज्जा की जाती है ।
लाखो हज़ारो भक्तजन भगवान के रथ को खींचकर धन्य मानते है । इस पर्व को लेकर समाज में बहुत उत्साह रहता है भक्तो का सैलाब धार्मिक राजधानी की और बढ़ता है।
इस अवसर पर मंदिर में रातभर विभिन्न मंडलियों द्वारा भजन किये जाते है । रथ के साथ बैंडबाजे ऊंट, हाथी, घोड़े, ढोलक की ताल, अखाड़े,डीजे, झांकिया रथयात्रा की शोभा बढाती है और इस तरह भगवान की शाही यात्रा उज्जैन घूमकर पुनः मंदिर पहुचती है मंदिर में सामूहिक भोज भंडारा भी खाती समाज द्वारा किया जाता है जो भगवान का प्रसाद माना जाता है फिर महा आरती के साथ पुनः भगवान मंदिर में विराजते है कहते है इस दिन भगवान् अपनी प्रजा को देखने के लिए मंदिर से निकलते है जो भी भक्त भगवान् तक नहीं पहुंच सका भगवान खुद उसे दर्शन देने निकलते है ।
महाभारत का युद्ध के बाद भगवान कृष्ण अपनी बहन सुभद्रा और भाई बलराम के साथ रथ में बैठकर द्वारिका पूरी जाते है और गोपिया उनके रथ को खींचती है ।
जगन्नाथ पूरी में भगवान के रथ को राजा सोने की झाड़ू से रथ को भखरते अर्थात सफाई करते थे उस समय केवल नेपाल के और पूरी के राजा जो की चंद्रवंशी थे वे ही केवल मंदिर की मूर्तियों को छू सकते थे क्योंकि वे चन्द्र कुल अर्थात चन्द्रवंश से थे ।
खाती समाज की कुलदेवी महागौरी है जो दुर्गाजी का आठवा रूप है ।इसे समाज की शक्ति उपासना का पर्व माना जाता है ।महिनो पहले से ही गौरी माँ की पूजन की तैयारिया शुरू हो जाती है । देश विदेश से लोग अष्टमी पूजन के लिए घर आ जाते है इस उत्सव को विशेष महत्व दिया जाता है भगवान वेदव्यास जी ने कहा है की ”है माता तू स्मरण मंत्र से ही भयो का विनाश कर देती है। ” माता महागौरी की पूजा गंध, पुष्प, धुप, दीप, नैवेध से की जाती है ममता, समता और क्षमता की त्रिवेणी का नाम माँ है | पुत्र कुपुत्र हो सकता है माता कुमाता नहीं पूजा के अंत में क्षमा मांगी जाती है।
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आदिवासी समाज का इतिहास और संस्कृति:adiwasi samaj itihas









आदिवासी शब्द का सामान्यतः अनुवाद ' स्वदेशी लोग ' या 'मूल निवासी' होता है, और इसका शाब्दिक अर्थ है 'आदि या आरंभिक समय', और 'वासी या निवासी'।आदिवासी समाज की पहचान उनकी भाषा, संस्कृति, और त्योहारों से होती है.
आदिवासी समाज के लोग प्रकृति के सभी घटकों को पूजते हैं.
आदिवासी समाज के लोग जल-जंगल के बेहद करीब होते हैं.
आदिवासी समाज के लोग खेती-किसानी से जुड़े होते हैं.आदिवासी समाज के लोग अपने लिए अलग से धार्मिक कोड (सरना कोड या आदिवासी धर्म कोड) की मांग करते हैं.
आदिवासी समाज के लोग अपनी संस्कृति और परंपराओं को सुरक्षित रखने के लिए चाहते हैं.
आदिवासी समाज के लोगों के अधिकारों को राष्ट्रीय कानून, सन्धियों और अंतर्राष्ट्रीय कानून में रेखांकित किया गया है.
आदिवासी समाज के लोग प्रकृति-पूजक हैं.
आदिवासी समाज के लोग वन, पर्वत, नदियों एवं सूर्य की आराधना करते हैं.
आदिवासी समाज के लोग अपनी कई मूलभूत सुविधाएं जंगलों से प्राप्त करते हैं.
आदिवासी समाज के लोग सामाजिक और सांस्कृतिक स्तर पर प्रकृति से गहरे जुड़े होते हैं.
आदिवासी समाज के लोगों के पास लोकगीतों की धरोहर है.

भारत में आदिवासियों का धर्म क्या है?

कई आदिवासी लोग जीववादी हैं, कई लोग सरना धर्म का पालन करते हैं जो प्रकृति में प्रकट होने वाली सर्वोच्च आत्मा के प्रति श्रद्धा पर आधारित है और कई आदिवासी लोगों की पहचान का केंद्र है





 
  भारत की जनसंख्या का 8.6% (10 करोड़) जितना एक बड़ा हिस्सा आदिवासियों का है। पुरातन लेखों में आदिवासियों को अत्विका और वनवासी भी कहा गया है (संस्कृत ग्रंथों में)। संविधान में आदिवासियों के लिए अनुसूचित जनजाति पद का उपयोग किया गया है। भारत के प्रमुख आदिवासी समुदायों में गोंड, मुंडा, खड़िया, हो, बोडो, भील, खासी, सहरिया, गरासिया, संथाल, मीणा, उरांव, परधान, बिरहोर, पारधी, आंध, टाकणकार आदि हैं।
 
 आमतौर पर आदिवासियों को भारत में जनजातीय लोगों के रूप में जाना जाता है। आदिवासी मुख्य रूप से भारतीय राज्यों उड़ीसा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल में अल्पसंख्यक है जबकि भारतीय पूर्वोत्तर राज्यों में यह बहुसंख्यक हैं, जैसे मिजोरम। भारत सरकार ने इन्हें भारत के संविधान की पांचवी अनुसूची में ” अनुसूचित जनजातियों ” के रूप में मान्यता दी है। 
 जाति इतिहासविद डॉ.दयाराम आलोक के मतानुसार आदिवासियों का अपना धर्म है। ये प्रकृति पूजक हैं और जंगल, पहाड़, नदियों एवं सूर्य की आराधना करते हैं। आधुनिक काल में जबरन बाह्य संपर्क में आने के फलस्वरूप इन्होंने हिंदू, ईसाई एवं इस्लाम धर्म को भी अपनाया है। अंग्रेजी राज के दौरान बड़ी संख्या में ये ईसाई बने तो आजादी के बाद इनके हिूंदकरण का प्रयास तेजी से हुआ है। परंतु आज ये स्वयं की धार्मिक पहचान के लिए संगठित हो रहे हैं और भारत सरकार से जनगणना में अपने लिए अलग से धार्मिक कोड की मांग कर रहे हैं।
आदिवासी कौन जाति में आते हैं?
भारतीय संविधान में आदिवासियों के लिए 'अनुसूचित जनजाति' पद का उपयोग किया गया है। भारत के प्रमुख आदिवासी समुदायों में मीणा ,भील मीणा,गोंड, हल्बा ,मुण्डा, ,खड़िया, बोडो, कोल, भील,नायक, सहरिया, संथाल ,भूमिज, हो, उरांव, बिरहोर, पारधी, असुर, भिलाला,आदि हैं। भारत में आदिवासियों को प्रायः 'जनजातीय लोग' के रूप में जाना जाता है।
आदिवासियों का अपना धर्म है, जिसे सरना धर्म कहते हैं. यह धर्म प्रकृति की पूजा पर आधारित है. सरना धर्म को 'आदि धर्म' भी कहा जाता है. आदिवासी समुदाय के कई लोग इस धर्म को मानते हैं. हालांकि, कई आदिवासी हिंदू धर्म, ईसाई धर्म, और इस्लाम धर्म को भी मानते हैं.

आदिवासी की कुल देवी कौन है 

सात माता को कुलदेवी के रूप में पूजते हैं आदिवासी
   ग्राम टेमरिया में तालाब के पास घने जंगल के बीच वीरान क्षेत्र में विराजित सात माता का यह क्षेत्र अतिप्राचीन है। आदिवासी समाज के लोग सात माता को कुलदेवी के रूप में पूजते हैं। जंगल में सागवान वृक्षों के बीच विराजित माता का यह क्षेत्र दर्शनीय व पूजनीय है।
आदिवासियों का भगवान कौन है?

बाघेशुर - मध्य भारत की जनजातियों के बाघ देवता
'बाघेशुर' का अर्थ है बाघ देवता, जिसे मध्य भारत की जनजातियाँ, खास तौर पर बैगा लोग पूजते हैं
 

आदिवासी का पूर्वज कौन था?

यह प्रत्येक समुदाय अपनी अलग धार्मिक विशेषताओं के आधार पर निर्धारित करता है। आदिवासी हिन्दू है इसलिए उनके भी गोत्र है और यह गोत्र ही उनके पूर्वज के नाम है । देवादिदेव महादेव और मां काली तो उनके आराध्य देवी देवता हैं ।

महाभारत में आदिवासी कौन थे?

महाभारत में जनजातीय पात्र का उदाहरण है एकलव्य. निषाद राजकुमार एकलव्य अपनी मेहनत से बना धनुषधारी है, जो कौरवों और पांडवों के गुरु द्रोणाचार्य की प्रतिमा से प्रेरणा लेकर अभ्यास करता है. द्रोणाचार्य उससे गुरु दक्षिणा के रूप में उससे उसका दाहिना अंगूठा मांग लेते हैं, इसके बावजूद वह उन्हें पूरा सम्मान देता है.

आदिवासी का गुरु कौन है ?

कौन थे गोविंद गुरु (Govind Guru Banjara)
इस इलाके में भील, बंजारा और आदिवासी समुदाय के दूसरे लोग गोविंद गुरु को अपना सबसे बड़ा आराध्य मानते हैं. 20 दिसंबर 1858 को राजस्थान के डूंगरपुर के बासिया गांव में जन्मे गोविंद गुरु का पूरा नाम गोविंद गिरी था.

क्या आदिवासी हिन्दू हैं?

 भारत के सभी मूल या स्वदेशी धर्म मोटे तौर पर हिंदू धर्म के अंतर्गत आते हैं , क्योंकि संविधान केवल वैदिक धर्मों को हिंदू धर्म के रूप में वर्गीकृत नहीं करता है, जैसा कि बोलचाल के मानदंड में उपयोग किया जाता है।
क्या कृष्ण आदिवासी देवता थे?
यादवों के देवता माने जाने वाले आदिवासी नायक और धार्मिक नेता कृष्ण की पूजा ने पंचरात्र और उससे पहले भागवत धर्म के रूप में सांप्रदायिक रूप ले लिया। यह परंपरा बाद में नारायण की परंपरा में विलीन हो गई। गोपाल कृष्ण के चरित्र को अक्सर गैर-वैदिक माना जाता है।
गोंड जनजाति के मुख्य देवी-देवताओं में बूड़ादेव, दुल्लादेव, घनश्यामदेव, बूड़ापेन (सूर्य), और भीवासू शामिल हैं. इनके अलावा, फसल, शिकार, बीमारियों, और वर्षा से जुड़े भी कई देवी-देवता हैं. 
गोंड जनजाति के लोग बहुत धार्मिक हैं.
वे कई शगुनों और मिथकों में भी विश्वास करते हैं.
गोंड जनजाति के लोग पूर्वजों की पूजा करते हैं.
गोंड जनजाति के लोग मृत्यु के बाद के जीवन और देवताओं को खुश करने के लिए पौधों और जानवरों की बलि देते हैं.
गोंड जनजाति के लोग भगवान हवा, पानी, और ज़मीन को नियंत्रित करने वाले मानते हैं.
गोंड जनजाति के लोग बारादेव (जिनके अन्य नाम भगवान, श्री शंभु महादेव और पर्सा पेन हैं) की पूजा करते हैं.
गोंड जनजाति के लोग भूत-प्रेत और जादू-टोने में काफ़ी विश्वास करते हैं. 

मावली माता गोंड आदिवासियों की प्रमुख मात्र देवी है। इस देवी का वर्तमान निवास स्थान मावली पठार में है। आदिवासियों का विश्वास है कि मावली माता दंतेश्वरी देवी की बुआ लगती हैं और इस कारण उनका स्थान है दंतेश्वरी देवी के ऊपर है

आदिवासी समाज में कितने सरनेम होते हैं?

आदिवासी समाज में कई सरनेम होते हैं, क्योंकि इसमें कई जनजातियां हैं. इनमें से कुछ प्रमुख जनजातियां हैं - गोंड, मुंडा, खड़िया, उरांव, संथाल, भील, कोल, बोडो, सहरिया, भूमिज, हो, पारधी, असुर, भिलाला.

आदिवासी समाज में गोत्रों की भी व्यवस्था है. गोत्रों के बारे में ज़्यादा जानकारीः

मुंडा जाति के लोग बाहर शादी के लिए कई छोटे वर्गों में बंटे होते हैं, जिन्हें किली कहते हैं.

किली की उत्पत्ति किसी प्राकृतिक पदार्थ से हुई है, जैसे कोई जानवर, पक्षी, जलचर, थलचर, या पौधा.

गोंड समाज पांच प्रमुख गोत्रों में बंटा है - छिदैया, नेताम, मरकाम, मरई, और पोर्ते.

हर गोत्र के गोंडों का परघनियां परधान उन्हीं के गोत्र का होना चाहिए.

टोटम को मानने वाले समूह को 'गोत्र' कहा जाता है.

'मिंज़' एक गोत्र है जिसका टोटम डुंगडुँगिया मछली है.

'लकड़ा' गोत्र का टोटम बाघ है.

'पन्ना' गोत्र का टोटम लोहा है.

'तिग्गा' का टोटम बंदर है.

क्या शिव आदिवासी थे?

भगवान शिव को आदिदेव, आदिनाथ और आदियोगी कहा जाता है। आदि का अर्थ सबसे प्राचीन प्रारंभिक, प्रथम और आदिम। शिव आदिवासियों के देवता हैं। शिव खुद ही एक आदिवासी थे।

आदिवासी का मसीहा कौन हैं ?

''आदिवासियों के मसीहा'' नाम से चर्चित, वनवासी संघ के स्थापना करने वाले और एकी आन्दोलन चलाकर आदिवासियों, किसानों और कामगारों को सामन्ती अत्याचारों के खिलाफ एकजूट करने वाले मातीलाल तेजावत 1886 ई. में झाड़ोल, उदयपुर के कोल्यारी में जन्मे थे।

आदिवासी में सबसे ऊंची जाति कौन सी है?
दक्षिण क्षेत्र की प्रमुख जनजाति गोंड है। जनसंख्या की दृष्टि से यह सबसे बड़ा आदिवासी समूह 
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24.6.21

ढोली(दमामी,नगारची ,बारेठ)) जाती का इतिहास:Dholi Caste

वीडिओ 



ढोली समुदाय खुद को गंधर्व देव की सन्तान मानते हैं. राजा-महाराजाओं के काल में युद्ध के दौरान रणभेरी बजाने वालों के तौर पर ये जाति अस्तित्व में आई और ढोल बजाने की वजह से इन्हें ढोली कहा जाने लगा|
दमामी समाज की उत्पति – यह जाति शुद्ध क्षत्रिय है जो तीन प्रकार से बनी है
1. प्रसन्नतापूर्वक
2,इनका राज्य छीन कर जबरदस्ती बनाये हुये ।
3,कुछ आपत्तिवश इनमे मिले हुये ।
 किन्तु अधिकांश खांपे इस समाज में वे है, जिनको भिन्न भिन्न राजाओं ने अपने भाईयों में से तथा संबंधित  राजपूतों में से जो रणकुशल नायक थे, चुन चुन कर बनाई है यह समाज राजस्थान में क्षेत्र अनुसार कई नामो से पुकारी जाती है । जैसे नगारची ,राणा ,बारोट और दमामी। 
 इस जाति का इतिहास भी सिवाय राजपूतों के संसार में कोई और नहीं जानता और न कोई धार्मिक पुस्तक में ही इनका उल्लेख है । इसका एकमात्र कारण यह है कि यह जाति प्राचीन नहीं बल्कि अर्वाचिन है । यह नई न्यात अर्थात् नवीन जाति कहलाती है किन्तु दुर्भाग्यवश राजपूतों की स्वार्थमयी विचित्र नीति ने और द्वेषियों के विरोध ने इनको इतना गिराया है कि आज आम जनता में इनकी प्रतिष्ठा  पहिले की तरह नहीं रही |
 इस जाति के लोगों को  बारहठ  भी कहते है । जिसका अर्थ द्वार पर हठ करने वाला है । रणधवल (दमामी-नगारची) समाज की प्राचीन उपाधि बारहठ ही है मगर संवत 1808 में जोधपुर महाराज बख्तसिंह जी ने यह पदवी चारण समाज को देदी । इसी कारण मारवाड़ में बारेठ चारण कहलाते है |शेष मेवाड़ ,हाड़ोती आदि स्थानों  में लोग  नगारची जाति को ही बारहठ कहते आ रहे है । सोलंकी और गौड़ क्षत्रियों के यहां पोलपात नगारची जाति को ही बारहठ  कहते है जो   दमामी राजपूत जाति ही है
राजपूताने में क्षत्रियों का कोई ऐसा छोटे से छोटा भी ठिकाना नहीं है जहां पर दमामी कौम के  एक दो घर नहीं हों  और इन लोगो के गुजारे के लिए माफ़ी की जमीन और राज्य में तथा प्रजा में लगाने नहीं हो । चारण जाति के लोग  खास खास ठिकानों में ही है । जिससे भी स्पष्ट सिद्ध है कि राजपूत जाति के वास्तविक पोलपात दमामी ही है 
डांगी- राव डांगी जी के वंशज ढोली कहलाये। राव डांगी जी के पास किसी प्रकार कि भूमी नहीँ थी व ईसने डूमन या ढोली जाती की लङकी से शादी की । उसकी सन्तान कही ढोली तो कहीँ डांगी नाम से बसते है। राव डांगी जी के वंशज ढोली कहलाये।
डॉ. दयाराम आलोक के अनुसार, ढोली जाति की उत्पत्ति डांगी जाति से नहीं हुई है, बल्कि यह एक अलग जाति है जो पीढ़ियों से चली आ रही है। ढोली जाति के लोग ढोल और नगाड़े बजाने का काम करते थे, इसलिए उन्हें ढोली या नगारसी कहा जाता था।डांगी जाति के एक व्यक्ति ने ढोली जाति की लड़की से शादी की, जिससे उनका वंश राजपूत से अलग हो गया और ढोली वंश बन गया। इस प्रकार, डांगी के वंशज राजपूतों से अलग हो गए, लेकिन उनके रिश्ते और नाते अभी भी बने रहे।उनके अनुसार, राजस्थान में राठौड़ राजपूतों के साथ-साथ ढोली जाति भी फैल गई। यह सिलसिला आज तक कायम है।यह जानकारी डॉ. दयाराम आलोक के शोध और अध्ययन पर आधारित है, जो जाति इतिहास के क्षेत्र में एक प्रमुख विद्वान हैं|
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23.6.21

जाट जाति की उत्पत्ति का इतिहास:Jat jati ka itihas





जाट जाति वर्तमान समय की सबसे प्रतिष्ठित जातियों में से एक मानी जाती है। जाट क्षत्रिय समुदाय के अभिन्न अंग माने जाते हैं, इनका विस्तार भारत में मुख्यत: "पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात आदि भारत के पठार इलाकों मैं है।
 पंजाब में जट्ट (Jatt) एवं अन्य राज्यों में इन्हें जाट (Jaat) नाम से संबोधित किया जाता है। जाट समाज के लोग आज के आधुनिक युग में  भी अपनी पुरानी परंपराओं से जुड़े हुए हैं, इस जाति की सामाजिक संरचना बेजोड़ है। जाट समाज की गोत्र और खाप  व्यवस्था प्राचीन समय की मानी जाती है।
जाट समाज की उत्पत्ति के विषय में कई मान्यताएं हैं  एक प्राचीन मान्यता के अनुसार कहा जाता है कि राजसूय यज्ञ के बाद युधिष्ठिर को 'जेष्ठ' कहा गया और बाद में युधिष्ठिर की संतान को 'जेठर' शब्द से संबोधित किया जाने लगा, जैसे जैसे समय बीतता गया 'जेठर'  को कालांतर मे जाट नाम से संबोधित किया जाने लगा। इस मान्यता के अनुसार जाट समाज की उत्पत्ति युधिष्ठिर से मानी जाती है।
  इसके अलावा एक पौराणिक कथा के अनुसार भगवान शिव शंकर से जाट समुदाय की उत्पत्ति को जोड़कर देखा जाता है, इस मान्यता के पीछे एक दिलचस्प कहानी है, यह कहानी 'देवसंहिता' नामक पुस्तक में उल्लेखित है। इस कहानी के अनुसार शिव के ससुर राजा दक्ष ने हरिद्वार के पास 'कनखल' में एक यज्ञ का आयोजन किया था। इस यज्ञ में सभी देवी देवताओं को बुलाया गया लेकिन भगवान शिव और शिव की पत्नी 'सती' को कोई निमंत्रण प्राप्त नहीं हुआ।
 जब सती को पिता के द्वारा यज्ञ के बारे में खबर प्राप्त हुई तो शिव से अपने पिता के यज्ञ कार्यक्रम में जाने की आज्ञा मांगी। शिव ने उन्हें यह कहकर आज्ञा दे दी कि - "तुम उनकी पुत्री हो और तुम्हे अपने घर बिना निमंत्रण के भी जा सकती हो" शिव से अनुमति लेकर सती अपने पिता के द्वारा आयोजित यज्ञ कार्यक्रम में जा पहुंची, लेकिन वहां सती को अपमानित किया गया एवं शिव के बारे में भी बुरा भला कहा गया। इसी बात पर क्रोधित होकर सती ने हवन कुंड में कूदकर आत्मदाह कर लिया।
 जब इस बात का पता भगवान शिव को चला तो वह क्रोधित हो उठे और अपनी जटाओं से वीरभद्र नामक गण उत्पन्न किया | वीरभद्र यज्ञ आयोजित किए जाने वाले स्थान पर जाकर नरसंहार करता है, तथा शिव के ससुर दक्ष का सर काट देता है। इस नरसंहार को रोकने के लिए भगवान विष्णु, ब्रह्मा और सभी देवी देवता शिव से राजा दक्ष को माफ करने की याचना करते हैं। सभी देवी देवताओं की विनती के बाद भगवान शिव शांत हो जाते हैं और राजा दक्ष को पुनर्जीवित कर देते हैं।
इस कथा के अंतर्गत जो  वीरभद्र नामक किरदार है, उसे जाट समाज का पूर्वज माना जाता है।  
 जाट भारत की पुरानी जातियों में से एक है, विभिन्न इतिहासकारों का जाटो की उत्पत्ति की लेकर अलग-अलग मत है। कई इतिहासकारों का मानना है कि जाट शब्द की उत्पति महाराज युधिष्ठिर से हुई, उन्हें श्री कृष्ण द्वारा ज्येष्ठ से सम्बोधित किया गया, उन्हीं के वंशज ज्येष्ठ और फिर अपभ्रंश से जाट कहलाये।
  जाटों ने कभी ब्राह्मणवाद को स्वीकार नहीं किया। जाट समाज के लोग अपने पूर्वजों की पूजा करते हैं, जिसे भंडारा कहा जाता है। इस जाति के लोग भगवान कृष्ण को अपना पूर्वज मानते हैं, लेकिन इस बात का प्रमाण किसी भी ग्रंथ में देखने को नहीं मिलता है। लेकिन मुख्यत: मूल रूप से इस जाति के लोग भारतीय हैं।
 जाटों की वर्तमान स्थिति  पहले से बेहतर है, ज्यादातर जाट मुख्य रूप से खेती करते हैं। इस जाति के लोग मुख्य रूप से ग्रामीण इलाकों में रहते हैं।  जाट समाज के लोगों की आर्थिक Growth Rate अन्य जातियों के मुकाबले बेहतर है।
जाटों की जनसंख्या 21वीं सदी के पूर्वार्द्ध में, पंजाब की कुल जनसंख्या का 20 प्रतिशत जाट थी, लगभग 10 प्रतिशत जनसंख्या ब्लोचिस्तान, राजस्थान और दिल्ली तथा 2 से 5 प्रतिशत जनसंख्या सिन्ध, उत्तर-पश्चिम सीमान्त और उत्तर प्रदेश में रहती थी। पाकिस्तान के 40 लाख जाट मुस्लिम हैं; भारत के लगभग 60 लाख जाट दो अलग जातियों के रूप में विभाजित हैं: एक सिख जो मुख्यतः पंजाब केन्द्रित हैं तथा अन्य हिन्दू हैं।
इतिहास के महान जाट
महाराजा रणजीत सिंह
महाराजा सूरजमल
तेजाजी
महाराजा जवाहर सिंह
  जाति इतिहासविद  डॉ . दयाराम आलोक के मतानुसार 17वीं शताब्दी के अंत और 18वीं शताब्दी के प्रारंभ में जाटों ने मुगल साम्राज्य के खिलाफ हथियार उठाए| हिंदू जाट राज्य महाराजा सूरजमल के अधीन अपने चरम पर पहुंच गया 20वीं शताब्दी तक पंजाब पश्चिम उत्तर प्रदेश राजस्थान हरियाणा और दिल्ली सहित उत्तर भारत के कई हिस्सों में जमींदार जाट एक प्रभावशाली समूह बन गए इन वर्षों में कई जाटों ने शहरी नौकरियों के पक्ष में कृषि को छोड़ दिया और उच्च सामाजिक स्थिति का दावा करने के लिए अपनी प्रमुख आर्थिक और राजनीतिक स्थिति का उपयोग किया

आजादी में योगदान और जाट -

कई इतिहासकार 1857 की क्रांति को स्वतंत्रता संग्राम नहीं मानते हैं। वीर सावरकर ने 1857 की क्रांति को प्रथम स्वतंत्रता संग्राम मानते हुए पुस्तक लिखी जिसमें लिखा कि क्रांति की शुरुआत 10 मई को मेरठ से शुरु हुई, किन्तु जाट बाहुल्य इस क्षेत्र के जाटो का नाम नहीं लिखे जाने से स्वतंत्रता संग्राम में अपनी मजबूती खो बैठे। क्रांति महज रानी लक्ष्मी बाई, तात्या टोपे, टीपू सुल्तान के इर्द-गिर्द घूमती रहीं तो वही मेरठ से महज मंगल पांडे के इर्द-गिर्द ही रह गई|
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11.5.21

बांछड़ा जाती की जानकारी:Banchada caste history

Dr.Dayaram Aalok donates benches to Hindu temples and Mukti Dham 


भारत में बेटियों के लिए और महिलाओं के लिए कई सरकार द्वारा कई स्कीम चलाई गई हैं. उज्जवला योजना से लेकर विधवा पेंशन तक ऐसा बहुत कुछ है जो महिलाओं की भलाई के लिए किया गया है, लेकिन फिर भी बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ का नारा देने वाले इस देश में बच्चियों का गर्भपात करवाया जाता है और पुरुष और महिलाओं की संख्या में बहुत बड़ा फर्क है. पर देश का एक समुदाय ऐसा है जो बेटी के पैदा होने पर खुशियां भी मनाता है और उन्हें बहुत अच्छे से पालता भी है. उन्हें काम भी करने देता है पर काम क्या है ये जानकर कोई भी समाज या सरकार चिंता में पड़ जाएगी!
मध्यप्रदेश का बांछड़ा समुदाय लड़कियों के पैदा होने पर खुशियां मनाता है क्योंकि इस समुदाय के लोग जिस्मफरोशी के धंधे से अपना घर चलाते हैं. लड़की पैदा होने का मतलब है एक और इंसान हो जाएगा घर चलाने के लिए.
हमारे सभ्य समाज के लोगों को वेश्यावृति के बारे में बात करने में शर्म आती है क्योंकि इसे वो सही नहीं मानते, घिनौना काम मानते हैं, लेकिन ये ही लोग दिन के उजाले से निकलते ही रात के अंधियारे में इन इलाकों की ख़ाक छानना शुरू कर देते हैं। ये बात भले ही आम लोगों के लिए चौंकाने वाली हो, लेकिन मालवा अंचल में 200 वर्षों से बेटी को सेक्स बाज़ार में धकेलने की परंपरा चली आ रही है। दरअसल इन गांवों में रहने वाले ‘बांछड़ा समुदाय’ के लिए बेटी के जिस्म का सौदा आजीविका का एकमात्र ज़रिया बना हुआ है, यहां 'वेश्यावृती' एक परंपरा है।
वैसे तो भारतीय समाज में आज भी बेटी को बोझ समझा जाता हो, लेकिन बांछड़ा समुदाय में बेटी पैदा होने पर जश्न मनाया जाता है। बेटी के जन्म की खूब धूम होती है क्योंकि ये बेटी बड़ी होकर कमाई का ज़रिया बनती है.. चलो कहीं तो बेटियां आगे हैं (शर्मनाक)। इस समुदाय में यदि कोई लड़का शादी करना चाहे तो उसे दहेज़ में 15 लाख रुपए देना अनिवार्य है। इस वजह से बांछड़ा समुदाय के अधिकांश लड़के कुंवारे ही रह जाते हैं। यहां पर ये धंधा या कहें कि गंदगी इतनी फैल चुकी है कि बाछड़ा समाज देह मंडी के रूप में कुख्यात है, जो वेश्यावृत्ति के दूसरे ठिकानों की तुलना में इस मायने में अनूठे हैं, कि यहां सदियों से लोग अपनी ही बेटियों को इस काम में लगाए हुए हैं। इनके लिए ज्यादा बेटियों का मतलब है, ज्यादा ग्राहक!
 भारत में एक ऐसी जगह है जहां खुद मां-बाप अपने बेटी से जिस्‍मफरोशी का धंधा करवाते हैं और खुद ही ग्राहक भी ढूंढ कर लाते हैं तो आप यकीन नहीं करेंगे। लेकिन बता दें कि ये सच है। इस जगह बेटी पैदा होने पर जश्‍न मनाया जाता है। इस जश्‍न के पीछे का कारण भी उतना ही भयावह है। हम बात कर रहे हैं मध्यप्रदेश के मालवा इलाके के रतलाम, मंदसौर और नीमच जिलों में निवास करने वाले बांछड़ा समुदाय की जहां लड़की होने पर जश्न इसलिए मनाया जाता है ताकि बड़ा होने पर उन्हें देह व्यापार के दलदल में धकेला जा सके। अब जो ताजा मामला सामने आया है उसके मुताबिक बांछड़ा समुदाय के लोग दूसरे समुदायों से लड़कियों को खरीद कर उन्हें देह व्यापार में धकेल रहे हैं। पेशे से वकील एक आरटीआई एक्टिविस्‍ट अमित शर्मा ने इस बात पर चिंता जाहिर की है और कहा है कि इस तरह इस गंदे धंधे में शामिल महिलाओं की संख्‍या लगातार बढ़ रही है। विस्‍तार से जानिए पूरा मामला
बेहद अजीब है सामाजिक मान्‍यता
बांछड़ा समुदाय में देहव्यापार को सामाजिक मान्यता है और इसलिये इनके परिवार में लड़की का होना बड़ा अहमियत रखता है। बांछड़ा समुदाय में प्रथा के अनुसार घर में जन्म लेने वाली पहली बेटी को जिस्मफरोशी करनी ही पड़ती है। मालवा में करीब 70 गांवों में जिस्मफरोशी की करीब 250 मंडियां हैं, जहां खुलेआम परिवार के सदस्य ही बेटी के जिस्म का सौदा करते है।
बेटी के लिए ग्राहक पाकर खुश होते हैं मां-बाप इस समुदाय में बेटी के जिस्म के लिए मां-बाप ग्राहक का इंतज़ार करते है। कोई उनकी बेटी के साथ हम बिस्तर होने के लिए राजी हो जाता है तो उन्हें ख़ुशी होती है की चलो ग्राहक तो आया। सौदा होने के बाद बेटियां अपने परिजनों सामने ही हमबिस्‍तर हो जाती हैं। आश्चर्य की बात यह है कि परिवार में सामूहिक रूप से ग्राहक का इंतज़ार होता है, जिसको ग्राह‍क पहले मिलता है उसकी कीमत परिवार में सबसे ज्यादा होती है।
ज्‍यादा बेटी मतलब ज्‍यादा कमाई इस समुदाय में यदि कोई लड़का शादी करना चाहे तो उसे दहेज़ में 15 लाख रुपए देना अनिवार्य है। इस वजह से बांछड़ा समुदाय के अधिकांश लड़के कुंवारे ही रह जाते हैं। यहां पर ये धंधा या कहें कि गंदगी इतनी फैल चुकी है कि बाछड़ा समाज देह मंडी के रूप में कुख्यात है, जो वेश्यावृत्ति के दूसरे ठिकानों की तुलना में इस मायने में अनूठे हैं, कि यहां सदियों से लोग अपनी ही बेटियों को इस काम में लगाए हुए हैं। इनके लिए ज्यादा बेटियों का मतलब है, ज्यादा ग्राहक!
2000 से ज्‍यादा महिलाएं इस धंधे में शामिल बांछड़ा समुदाय के उत्थान के लिए काम करने वाले गैर सरकारी संगठन ‘‘ नई आभा सामाजिक चेतना समिति'' के संयोजक आकाश चौहान ने बताया, ‘‘ मंदसौर, नीमच और रतलाम जिले में 75 गांवों में बांछड़ा समुदाय की 23,000 की आबादी रहती है। इनमें 2,000 से अधिक महिलायें और युवतियां देह व्यापार में लिप्त हैं।'' चौहान ने दावा किया कि मंदसौर जिले की जनगणना के अनुसार यहां 1000 लड़कों पर 927 लड़कियां हैं, पर बांछड़ा समाज में स्थिति उलट है। महिला सशक्तिकरण विभाग द्वारा वर्ष 2015 में कराये गये सर्वे में 38 गांवों में 1047 बांछड़ा परिवार में इनकी कुल आबादी 3435 दर्ज की गयी थी। इनमें 2243 महिलायें और महज 1192 पुरूष थे, यानी पुरूषों के मुकाबले दो गुनी महिलायें।
दूसरे समुदाय की लड़कियां भी हो रही हैं शामिल वहीं नीमच जिले में वर्ष 2012 के एक सर्वे में 24 बांछड़ा बहुल गांवों में 1319 बांछड़ा परिवारों में 3595 महिलायें और 2770 पुरूष पाये गये। इस पूरे मामले में मालवा में पुलिस इंस्पेक्टर अनिरूद्व वाघिया ने बताया कि दूसरे समाज की लड़कियों को खरीदकर उनको वेश्यावृत्ति के धंधे मे धकेलना चौंकाने वाला हैं। नीमच, मन्दसौर जिले में इस तरह के अब तक करीब 70 से अधिक मामले उजागर हो चुके हैं।
 
  मंदसौर, नीमच और रतलाम के 75 गांव में निवासरत बाछड़ा समाज के 30 हजार लोग समाज की पहचान वर्षों से अछूत और आपराधिक प्रवृत्ति वाले होने की रही है। अब बदलाव की बयार चल रही है और निर्मल समाज का गठन कर युवा यह दाग मिटाने के लिए 5 साल से प्रयासरत है। असर यह हुआ कि समाज के 110 लोग कुरीतियों तिलांजलि देकर सरकारी नौकरी कर रहे हैं।
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विशिष्ट कवियों की चयनित कविताओं की सूची (लिंक्स)

स्वप्न झरे फूल से, मीत चुभे शूल से -गोपालदास "नीरज"

वीरों का कैसा हो वसंत - सुभद्राकुमारी चौहान

सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोसिताँ हमारा-अल्लामा इकबाल

उन्हें मनाने दो दीवाली-- डॉ॰दयाराम आलोक

जब तक धरती पर अंधकार - डॉ॰दयाराम आलोक

जब दीप जले आना जब शाम ढले आना - रविन्द्र जैन

सुमन कैसे सौरभीले: डॉ॰दयाराम आलोक

वह देश कौन सा है - रामनरेश त्रिपाठी

किडनी फेल (गुर्दे खराब ) की रामबाण औषधि

बीन भी हूँ मैं तुम्हारी रागिनी भी हूँ -महादेवी वर्मा

मधुर-मधुर मेरे दीपक जल - महादेवी वर्मा

प्रणय-गीत- डॉ॰दयाराम आलोक

गांधी की गीता - शैल चतुर्वेदी

तूफानों की ओर घुमा दो नाविक निज पतवार -शिवमंगलसिंह सुमन

सरहदें बुला रहीं.- डॉ॰दयाराम आलोक

जंगल गाथा -अशोक चक्रधर

मेमने ने देखे जब गैया के आंसू - अशोक चक्रधर

सूरदास के पद

रात और प्रभात.-डॉ॰दयाराम आलोक

घाघ कवि के दोहे -घाघ

मुझको भी राधा बना ले नंदलाल - बालकवि बैरागी

बादल राग -सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला"

आओ आज करें अभिनंदन.- डॉ॰दयाराम आलोक


8.5.21

कंजर जन जाति की जानकारी:Kanjar caste history



 प्राचीन काल की एक संकर जाति । विशेष—इसकी उत्पत्ति शौचकी स्त्री और शौंडिक पुरुष से मानी गई है और इसका काम गाना बजाना बतलाया गया है । ३. मनु के अनुसार क्षत्रियों की एक जाति जिसकी उत्पत्ति ब्रात्य क्षत्रियों से मानी जाती है । संपूर्ण उत्तर भारत की ग्राम्य और नगरीय जनसंख्या में छितराए कंजर जनजाति ऐसे कबीला हैं, जिनके कुछ समुदाय अपराध करना अपना मूल पेशा मानते हैं। माना जाता है कि कंजर अपराध करने से पहले ईश्वर का आशीर्वाद लेते हैं, जिसे पाती मांगना कहा जाता है। संगठित अपराधियों के सबसे क्रूर कबीलों में से एक कंजर प्रदेश के जिलों को पहले इलाकों में बांटते हैं। परिवार व रिश्तेदारों को मिलाकर तैयार की गई गैंग दीपावली की रात तांत्रिक अनुष्ठान करने के बाद घर से निकलती है। ठंड के मौसम में लूटपाट करने के बाद बसंत पंचमी से पहले घरों को लौट जाते हैं। 
 इतिहास विद् डा. रत्नाकर शुक्ल बताते हैं कि कंजरों तथा सांसिया,हाबूरा, बेरिया, भाट, नट, बंजारा, जोगी और बहेलिया आदि अन्य घुमक्कड़ कबीलों से कंजरों के बीच पर्याप्त सांस्कृतिक समानता मिलती है। एक ¨कवदंती के अनुसार कंजर दिव्य पूर्वज'मान'गुरु की संतान हैं। मान अपनी पत्नी नथिया कंजरिन के साथ जंगल में रहता था।  समाजशास्त्री डा. विद्याधर के मुताबिक इन कबीलों के पुरूष व घर की महिलाएं मिलकर अवैध शराब बनाती हैं। जिसे घर के पुरुष कबीले और कबीले के बाहर बेचते हैं। रोजाना रात को इस जाति की औरत और पुरुष दोनों ही साथ में शराब भी पीते हैं। पुलिस से बचने के लिए यह अपने घरों में सुरक्षा के काफी प्रबंध रखते हैं। भागने के लिए पीछे की तरफ खिड़की जरूर होती है परंतु चौखट पर दरवाजे नहीं होते हैं।
  
जाति इतिहासविद डॉ. दयाराम आलोक के मतानुसार कंजर जाति के लोग हनुमान और चौथ माता की पूजा करते हैं। कंजरों की कबीला पंचायत शक्तिशाली और सर्वमान्य सभा है। सभ्य समाज की दृष्टि से पेशेवर अपराधी माने जाने वाले कंजरों में भी कबीलाई नियमों के उल्लंघन पर कड़ी सजा मिलती है।
  कंजर एक घुमक्कड़ कबीला है जो सम्पूर्ण उत्तर भारत की ग्राम्य और नागरकि जनसंख्या में छितराया हुआ है। ये संभवत: द्रविड़ मूल के हैं। ' कंजर ' शब्द की उत्पत्ति संस्कृत 'कानन-चर' से हुई भी बताई जाती है। वैसे भाषा, नाम, संस्कृति आदि में उत्तर भारतीय प्रवृत्तियाँ कंजरों में इतनी बलवती हैं कि उनका मूल द्रविड़ मानना वैज्ञानिक नहीं जान पड़ता। कंजरों तथा साँसिया, हाबूरा, बेरिया, भाट, नट, बंजारा, जोगी और बहेलिया आदि अन्य घुमक्कड़ कबीलों में पर्याप्त सांस्कृतिक समानता मिलती है। एक किंवदंती के अनुसार कंजर दिव्य पूर्वज 'मान' गुरु की संतान हैं। मान अपनी पत्नी नथिया कंजरिन के साथ जंगल में रहता था। मान गुरु के पुरावृत्त को ऐतिहासिकता का पुट भी दिया गया है, जैसा उस आख्यान से विदित है जिसमें मान दिल्ली सुल्तान के दरबार में शाही पहलवान को कुश्ती मेंरों का कबीली संगठन विषम है। वे बहुत से अंतिर्विवाही (एंडोगैमस) विभागों और बहिर्विवाही (एक्सोगैमस) उपविभागों के नाम 1891 की जनगणना में दर्ज किए गए 106 कंजर उपविभागों के नाम हिंदू और छह के नाम मुसलमानी थे। कंजरों का विभाजन पेशेवर विभागों में हुआ है, जैसा उनके जल्लाद, कूँचबंद, पथरकट, दाछबंद आदि विभागीय नामों से स्पष्ट होता है। कंजरों में वयस्क विवाह प्रचलन है। यद्यपि स्त्रियों को विवाहपूर्व यौन स्वच्छंदता पर्याप्त मात्रा में प्राप्त होती है, तथापि विवाह के पश्चात्‌ उनसे पूर्ण पति व्रता  की अपेक्षा की जाती है। स्त्रीं एवं पुरुष दोनों के विवाहेतर यौन संबंध हेय समझे जाते हैं और दंडस्वरूप वंचित पति को अधिकार होता है कि वह अपराधी पुरुष की न केवल संपत्ति वरन संतान भी हस्तगत कर ले। विवाह वधू मूल्य देकर होता है। रकम का भुगतान दो किस्तों में होता है, एक विवाह के समय और दूसरी संतोनात्पत्ति के पश्चात्‌। परंपरागत विवाहों के अतिरिक्त पलायन विवाह (मैरिज बाई एलोपमेंट) का भी चलन है। अज्ञातवास से लौटने पर युग्म पूरे गाँव को भोज पर आमंत्रिक कर वैध पति-पत्नी का पद प्राप्त कर सकता है। विधवा विवाह संभव है और विधवा अधिकतर अपने अविवाहित देवर से ब्याही जाती है।
  पेशेवर नामधारी होने पर भी कंजरों ने किसी व्यवसाय विशेष को नहीं अपनाया। कुछ समय पूर्व तक ये यजमानी करते थे और गाँव वालों का मनोरंजन करने के बदले धन और मवेशियों के रूप में वार्षिक दान पाते थे। प्रत्येक कंजर परिवार की यजमानी में कुछ गाँव आते थे जहाँ वे उत्सव और विशेष अवसरों पर नाच गाकर गाँववालों का मनोरंजन करते थे। इनमें से कुछ परिवार गाँव की, मीना और अन्य जातियों के परंपरागत भाट और वंशावली संग्रहकर्ता का काम करते थे। कुछ कंजर स्त्रियाँ भीख माँगने के साथ-साथ वेश्यावृत्ति भी करती थीं। किंतु वर्तमान कंजर अपने परंपरागत धंधों को छोड़ आर्थिक दृष्टि से अधिक लाभदायक पेशों की ओर आकृष्ट हो रहे हैं।
वेशभूषा में कंजर अन्य ग्रामीण समुदायों के सदृश होते हैं। समय के साथ साथ दूसरो की तरह इनकी वेशभूषा भी बदल रही हैं|इनकी स्त्रियाँ मुसलमान स्त्रियों की भाँति लहँगे की बजाया लंबा कुरता और पाजामा पहनती हैं। खान-पान में ये कबीले जौ, बाजरे, कन्द, मूल, फल से लेकर छिपकली,बिल्ली गिरगिट और मेढ़क का मांस तक खाते हैं। छिपकली, साँडा, साँप और गिद्ध की खाल से विशेष प्रकार का तेल निकालकर ये उसे दु:साध्य रोगों की दवा कहकर बेचते हैं। भीख माँगनेवाली कंजर स्त्रियाँ प्राय: संभ्रांत कृषक महिलाओं को अपनी बातों फँसाकर बाँझपन तथा अन्य स्त्री रोगों की दवा बेचती हैं और हाथ देखकर भाग्य बताती हैं।
 कंजरों की कबीली पंचायत शक्तिशाली और सर्वमान्य सभा है। सभ्य समाज की दृष्टि से पेशेवर अपराधी माने जानेवाले कंजरों में भी कबीली नियमों के उल्लंघन की कड़ी सजा मिलती है। अपराध स्वीकृति के निराले और यातना पूर्ण ढंग अपनाए जाते हैं। कंजर कबीली देवी-देवताओं के साथ हिन्दू देवी देवताओं की भी मनौती करते हैं। विपत्ति पड़ने पर कबीली देवता 'अलमुंदी' और 'आसपाल' के क्रोध-शमन-हेतु बकरे, सुअर और मुर्गे की बलि दी जाती है। संपूर्ण भारत में एक गांव ऐसा है जहां पर इस घुमंतू जाति को स्थायी तौर पर बसाया गया है, यह ऐतिहासिक कार्य ग्राम पंचायत उमरिया, तहसील राठ जिला हमीरपुर उत्तर प्रदेश में लोधी समाज के बड़े जमींदार रघुवर दयाल लोधी व उनके पुत्र बृजेन्द्र सिंह उमरिया द्वारा आज से अस्सी वर्ष पूर्व किया गया था।आज भी वहां सैकड़ों कुंचबदिया परिवार स्थायी तौर पर निवास कर रहे हैं।
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