रस सिद्धांत : साहित्यिक आनंद की परिभाषा
काव्य या साहित्य को पढ़ने‑सुनने या देखने से जो आनंद मिलता है, उसे रस कहा जाता है।
✨ रस के अवयव और अंग
1. भाव
मन के विकारों या आवेगों को भाव कहते हैं।
स्थायी भाव (9 प्रकार): रति, उत्साह, विस्मय, हास, शोक, क्रोध, भय, जुगुप्सा, वैराग्य
संचारी भाव (33 प्रकार): शंका, चिंता, हर्ष, गर्व आदि
स्थायी भाव और रस का संबंध
| स्थायी भाव | रस |
|---|---|
| रति | श्रृंगार |
| उत्साह | वीर |
| वैराग्य | शांत |
| शोक | करुण |
| क्रोध | रौद्र |
| भय | भयानक |
| घृणा | वीभत्स |
| विस्मय | अद्भुत |
| हास | हास्य |
| वात्सलता | वात्सल्य |
2. विभाव
भावों के कारण को विभाव कहते हैं। इसके तीन अंग हैं:
आश्रय – जिनके हृदय में भाव जागते हैं
आलंबन – प्रमुख व्यक्ति/वस्तु जिससे भाव उत्पन्न होता है
उदीपन – प्रेरक तत्व जो भाव जागरण में सहायक हों
3. अनुभाव
भावों की बाहरी अभिव्यक्ति को अनुभाव कहते हैं।
🌸 रसों के प्रकार और उदाहरण
1. श्रृंगार रस
संयोग और वियोग दोनों रूपों में प्रेम का रस।
उदाहरण: "एक पल मेरे प्रिय के दृग पलक..."
2. वीर रस
उत्साह स्थायी भाव से उत्पन्न।
प्रकार: युध्यवीर, दानवीर, दयावीर, धर्मवीर।
3. शांत रस
संसार के प्रति निर्वेद से उत्पन्न।
4. करुण रस
इष्ट की हानि या वियोग से उत्पन्न।
5. रौद्र रस
विरोधी के प्रति क्रोध और प्रतिशोध।
6. भयानक रस
भय स्थायी भाव से उत्पन्न।
7. वीभत्स रस
जुगुप्सा और घृणा से उत्पन्न।
8. अद्भुत रस
आश्चर्य और विस्मय से उत्पन्न।
9. हास्य रस
हास और विनोद से उत्पन्न।
10. वात्सल्य रस
बाल‑रति पर आधारित, माता‑पिता का स्नेह।
✅ निष्कर्ष
रस सिद्धांत भारतीय काव्यशास्त्र का मूल है। भाव, विभाव और अनुभाव के संयोग से ही साहित्यिक आनंद की अनुभूति होती है।
काव्य या साहित्य को पढने-सुनने या देखने से जो आनंद मिलता है, उसे रस कहा जाता है!
रस के अवययो और अंगो पर प्रकाश डालिए!रस-निष्पति के तिन प्रमुख अवयय है-
1.भाव
2.विभाव
3.अनुभाव
1.भाव
मन के विकारो या आवेगों को भाव कहते है! ये दो प्रकार के होते है-
1.स्थायी भाव
2.व्यभिचारी या संचारी भाव
स्थायी भाव-ये प्रत्येक मनुष्य के ह्रदय में स्थायी रूप से स्थित होते है! कोई भी मनुष्य इनसे
वंचित नहीं है! ये संख्या नौ है-
रति, उत्साह, विस्मय, हास, शोक, क्रोध, भय, जुगुप्सा, बैराग्य!
स्थायी भाव रस
1.रति श्रृंगार
2.उत्साह वीर
3.वैराग्य शांत
4.शोक करुण
5.क्रोध रौद्र
6.भय भयानक
7.घृणा वीभत्स
8.बिस्मय अद्भुत
9.हास हास्य
10.वत्सलता वात्सल्य
तथा बुलबुलों की तरह उठाते गिरते रहते है! कुछ प्रमुख संचारी भाव निम्न है-
शंका, जड़ता, चिंता, उग्रता, हर्ष, गर्व आदि!
2.विभाव
विभाव का अर्थ है- भावो के कारण! जिन विषय-प्रस्तुतियों के द्वारा मन के स्थायी भाव
जाग्रत होते है, उन्हें विभाव कहते है!
विभाव के तिन अंग है-
आश्रय, आलंबन और उधीपन
1.आश्रय: जिनके ह्रदय में भाव जागते है, उन्हें आश्रय कहते है! ये दो प्रकार के होते है-
1.विभव के अंग:जैसे कहानी में राम को देखकर सीता के मन में प्रेम की अनुभाती हुई!
इसमें सीता आश्रय है! सीता के ह्रदय में प्रेम जाग्रत हुआ! सीता आश्रय विभव है!
2.सहृदय का ह्रदय:कहानी या काव्या को पढने, सुनने या देखने वाला भी आश्रय है! उसके
ह्रदय में सभी भाव जाग्रत होते है!
2.आलंबन:जिस प्रमुख व्यक्ति, वास्तु को देखकर ह्रदय में भाव जागता है, उसे आलंबन कहते है!
3.उधीपन:जिन प्रेरक व्यक्तियों के सहयोग से नुल भाव जागने में सहायता मिली, उन्हें उधीपन कहते है!
आश्रय की चेस्ठावो को अनुभाव कहते है!
1.श्रृंगार रस-

नायक-नायिका के प्रेम को देखकर श्रृंगार रस प्रकट होता है! यह सृष्टि का सबसे व्यापक भाव है
जो सभी में पाया जाता है, इसलिए इसे रसराज भी कहा जाता है! इसके दो प्रमुख प्रकार है-
1.संयोग श्रृंगार 2.वियोग श्रृंगार
संयोग श्रृंगार: उदाहरण-
एक पल मेरे प्रिय के दृग पलक, थे उठे ऊपर सहज निचे गिर
चपलता ने इसे विकंपित पुलक से दृढ किया मनो प्रणय सम्बन्ध था!
वियोग श्रृंगार: उदाहरण-
पीर मेरी कर रही गमगीन मुझको
और उससे भी अधिक तेरे नयन का नीर, रानी
और उससे भी अधिक हर पाँव की जंजीर, रानी!
2.वीर रस-

उत्साह स्थायी भाव जब विभावो अनुभावो और संचारी भावो की सहायता से पुष्ट होकर
आस्वादन के योग्य हो जाता है तब वीर रस निष्पन होता है!
वीर चार प्रकार के मने गए है-
(1)युद्याविर
(2)दानवीर
(3)दयावीर
4)धर्मवीर
इनमे युध्यविर रूप प्रमुख है!
उदाहरण- ‘‘हे सारथे ! हैं द्रोण क्या, देवेन्द्र भी आकर अड़े,
है खेल क्षत्रिय बालकों का व्यूह-भेदन कर लड़े।
3.शांत रस-
जहा संसार के प्रति निर्वेद रस रूप में परिणत होता है वहा शांत रस होता है!
उदाहरण: ऐसेहू साहब की सेवा सों होत चोरू रे।
अपनी न बूझ, न कहै को राँडरोरू रे।।
मुनि-मन-अगम, सुगत माइ-बापु सों।
कृपासिंधु, सहज सखा, सनेही आपु सों।।

इष्ट की हानि का चिर वियोग अर्थ हानि शोक का विभाग अनुभाव और संचारी भावो के सहयोग
से रस रूप में व्यक्त होता है, उसे करुण रस कहते है!
उदाहरण:
हा सही ना जाती मुझसे
अब आज भूख की जवाला !
कल से ही प्याश लगी है
हो रहा ह्रदय मतवाला!
सुनती हु तू राजा है
मै प्यारी बेटी तेरी!
क्या दया ना आती तुझको
यह दशा देख कर मेरी!
5.रौद्र रस
जहा विरोधी के प्रति प्रतिशोध एवं क्रोध का भाव जाग्रत हो, वहा रौद्र रस होता है!
उदाहरण:
श्रीकृष्ण के सुन वचन अर्जुन छोभ से जलने लगे!
सब शील अपना भूलकर करतल युगल मलने लगे!
संसार देखे अब हमारे शत्रु रन में मृत पड़े!
करते हुए यह घोषणा हो गए उठकर खड़े!!
6.भयानक रस-

जहा भय स्थायी भाव पुष्ट और विकशित हो वहा भयानक रस होता है!
उदाहरण:
एक ओर अजग्रही लखी, एक ओर मृगराय!
विकल बटोही बिच ही, परयो मूर्छा खाय!!
7.वीभत्स रस-

जहा किसी वास्तु अथवा दृश्य के प्रति जुगुप्सा का भाव परिप्रुष्ट हो, वहा वीभत्स रस होता है!
उदाहरण:
सिर पर बैठ्यो काग आँख दोउ खाक निकारत!
खींचत जिभाही स्यार अतिहि आनंद उर धारत!!
गीध जांघि को खोदी-खोदी के मांश उपारत!
स्वान अंगुरिन काटी-काटी के खात विदारत!!
8.अद्भुत रस-

आश्चर्जनक एवं विचित्र वास्तु के देखने व सुनने जब सब आश्चर्य का परिपोषण हो, तब अद्भुत
रस की प्रतीति होती है!
उदाहरण:
अखील भुवन चर अचर सब, हरी मुख में लखी मातु!
चकित भई गदगद वचन, विकशित दृग पुल्कातु!!
9.हास्य रस-

विलक्षण विषय द्वारा जहा हास्य का विस्तार एवं पोषण हो, वहा हास्य रस होते है!
उदाहरण:
लाला की लाली यो बोली-
सारा खाना ये चर जायेंगे!
जो बचे भूखे बैठे है
क्या पंडित जी को खायेंगे!!
10.वात्सल्य रस-

संस्कृत आचार्यो ने केवल नौ रासो को ही मान्यता दी है! कुछ आधुनिक विद्वान वात्सल्य और
भक्ति रस को भी मानते है! उनके अनुसार-बाल-रति के आधार पर क्रमशः वात्सल्य और भक्ति
रस का प्रकाशन होता है!
उदाहरण:
बाल दशा मुख निरखि जसोदा पुनि पुनि नन्द बुलावति!
अंचरा तर तै ढंकी सुर के प्रभु को दूध पियावति!!
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