30.5.26

डॉ. दयाराम आलोक : समाजसेवा, साहित्य और आध्यात्मिक साधना का अद्वितीय संगम

डॉ. दयाराम आलोक : समाजसेवा, साहित्य और आध्यात्मिक साधना का अद्वितीय संगम



जन्म एवं शिक्षा

डॉ. दयाराम आलोक का जन्म 11 अगस्त 1940 को मध्यप्रदेश के मंदसौर जिले के शामगढ़ नगर में दर्जी परिवार में हुआ। पिता पुरालाल जी राठौर और माता गंगा बाई के स्नेह में पले‑बढ़े। परिवार में छह भाई और तीन बहनें थीं। पारिवारिक व्यवसाय रेडीमेड वस्त्र बनाना और बेचना था।

हाईस्कूल परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण करने के बाद 1961 में शासकीय सेवा में अध्यापक पद पर नियुक्त हुए। 1969 में राजनीति विषय से एम.ए. किया। चिकित्सा क्षेत्र में भी उन्होंने उल्लेखनीय उपलब्धियाँ हासिल कीं — आयुर्वेद रत्न और लंदन से होम्योपैथिक उपाधि D.I.Hom प्राप्त की।

परिवार इतिवृत्त

डॉ. आलोक की पत्नी शांति देवी, झालरापाटन के सिपाही प्यारेलाल जी पंवार की पुत्री थीं। उनके पाँच संतानें हैं — एक पुत्र और चार पुत्रियाँ।

  • पुत्र डॉ. अनिल कुमार, दामोदर हॉस्पिटल एवं रिसर्च सेंटर, शामगढ़ के संचालक हैं।

  • बड़ी पुत्री छाया का विवाह सुरेश जी पंवार से हुआ।

  • अल्पना देवी का विवाह इंजीनियर विनोद कुमार चौहान से हुआ।

  • बेला बेन का विवाह संतोष कुमार परमार से हुआ।

  • छोटी पुत्री साधना का विवाह 1995 में हेमेन्द्र कुमार परमार से सम्पन्न हुआ।

धार्मिक, सामाजिक एवं आध्यात्मिक योगदान

डॉ. आलोक ने दर्जी समाज के उत्थान के लिए अनेक कार्य किए।

  • अखिल भारतीय दामोदर दर्जी महासंघ की स्थापना 14 जून 1965 को की।

  • 23 जून 1966 को डग दर्जी मंदिर में मूर्ति प्राण प्रतिष्ठा समारोह आयोजित कराया।

  • मध्यप्रदेश और राजस्थान के छह जिलों में मंदिरों और मुक्ति धामों में बैठने की सुविधा हेतु सैकड़ों सीमेंट बेंच दान किए।

  • 1981 में रामपुरा नगर में दर्जी समाज का पहला सामूहिक विवाह सम्मेलन आयोजित कर परंपरा की शुरुआत की।



  • 2010 में बोलिया ग्राम में निजी वित्त से पहला निशुल्क सामूहिक सम्मेलन आयोजित किया।

  • समाज की वैश्विक पहचान हेतु 15,000 व्यक्तियों को एक ही वंशवृक्ष में समाहित कर वेबसाइट पर उपलब्ध कराया।

दामोदर दर्जी महासंघ का गठन

14 जून 1965 को पूरालाल जी राठौर के आवास पर प्रथम अधिवेशन हुआ। इसमें 134 दर्जी बंधु उपस्थित हुए। श्री रामचन्द्र जी सिसोदिया अध्यक्ष बने, डॉ. आलोक संचालक और श्री सीताराम जी संतोषी कोषाध्यक्ष बने।

गांधी जयंती 2 अक्टूबर 2023 को महासंघ का पुनर्गठन हुआ और डॉ. आलोक अध्यक्ष बनाए गए।

डग दर्जी मंदिर का प्राण प्रतिष्ठा समारोह

1966 में भगवान सत्यनारायण की प्रतिमा सात वर्षों से बाहर रखी हुई थी। डॉ. आलोक ने समाज को एकजुट कर चंदा संग्रह किया। केवल 1 माह 8 दिन में पर्याप्त धन एकत्र कर 23 जून 1966 को भव्य प्राण प्रतिष्ठा समारोह सम्पन्न हुआ।

प्रेरणादायक श्लोक

जासु कृपा सु दयाल ||
मूक होई वाचाल, पंगु चढ़ै गिरिवर गहन ||

भावार्थ – प्रभु की कृपा से गूंगा बोलने लगता है और लंगड़ा भी पर्वत पर चढ़ जाता है।

साहित्यिक योगदान

डॉ. आलोक हिंदी साहित्य के प्रख्यात कवि हैं। उनकी कविताओं में भावनात्मक अभिव्यक्ति, सामाजिक चेतना और राष्ट्रीय भावना झलकती है।

प्रमुख कविताएँ

  • उन्हें मनाने दो दिवाली

  • आओ आज करें अभिनंदन

  • सरहदें बुला रहीं

  • गाँधी के अमृत वचन

  • सुमन कैसे सौरभीले

उनकी रचनाएँ कादंबिनी सहित अनेक पत्र‑पत्रिकाओं में प्रकाशित हुईं।

समाज के परिवारों की जानकारी

1965 में उन्होंने बड़े आकार के फार्म छपवाए, जिनमें व्यक्ति की संपूर्ण जानकारी दर्ज की जाती थी। दाहोद, लिमड़ी, झालोद आदि स्थानों का दौरा कर उन्होंने वंशावलियाँ तैयार कीं और "दर्जी समाज संदेश" वेबसाइट पर अपलोड कीं।

यह कार्य समाज के इतिहास और परंपराओं को संरक्षित करने में अत्यंत महत्वपूर्ण है।

विस्तारित काव्यात्मक विवरण

डॉ. आलोक का जीवन एक दीपक की तरह है, जो अंधकार में प्रकाश फैलाता है।


दीपक बन जलते रहे, तम को हरते राह में,
समाज सेवा, साहित्य साधना, जीवन की चाह में।
दर्जी समाज का गौरव, आलोक जिनका नाम,
कर्म, धर्म और ज्ञान से, किया जग में काम।

सत्कर्म पथ पर चलो, आलोक दिखलाएँ,

समाज उत्थान हेतु, जीवन अर्पित कर जाएँ।
कविता में गूँजे स्वर, सेवा में हो बलिदान,
डॉ. आलोक का जीवन, है युगों का सम्मान।

निष्कर्ष

डॉ. दयाराम आलोक का जीवन समाज सेवा, साहित्य और आध्यात्मिकता का अद्वितीय संगम है। उन्होंने दर्जी समाज को नई पहचान दी और हिंदी साहित्य को समृद्ध किया।

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